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नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं





नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं

जो शरीर के तथा ईश्वरीय के बीच के उपासना आराधना को तंत्र को अच्छी तरह समझ ले वह तांत्रिक न कि उड़द या निंबु का प्रयोग करने वाला ही  तांत्रिक होता हे। एक अफवाह या भ्रम फैलाया जाता है। किसी अदृश्य शक्ति  की आराधना हर व्यक्ति  करता है या कोई करवाता है। रूप अलग-अलग होते है। इसी तरह ईश्वर  है तो उनकी शक्ति का रूप अलग-अलग आता है। सनातन धर्म प्रकृति के अनुरूप प्रकृति विज्ञान को समझकर अपना, अपने परिवार के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक विकास करने का अलग-अलग रूप है। 

नवरात्रि में उपासना का अर्थ या अन्य त्यौहार का अर्थ हम हमेशा प्रकृति के परिवर्तन को धर्म से जोड़कर ऋतु के अनुसार आने वाली ऋतु के लिये अपने आप को बदलने के लिये शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रहे तथा अपना व अपने परिवार का विकास कर सके। यह एक वैज्ञानिक कारण है। भाद्रपद माह के बाद अश्विन माह मे लगभग वर्षा ऋतु मंे प्रवेश करते है वर्षा ऋतु मंे हमारी पाचन क्रिया कमजोर होती है परंतु शरद ऋतु से मजबुत होने लगती है। अतः बहुत अधिक अचानक हम अधिक पाचन क्रिया खराब न करें उसके लिये शारदीय नवरात्रि मंे उपवास का नियम है। 

नवरात्रि चार बार आती है। जिसमंे दो नवरात्रि गुप्त होती है। एसे तो और भी होती है गुप्त नवरात्रि मंे गुप्त आराधना होती है मतलब ऐसी आराधना जिसे हम अपने परिवार का तथा हमारा व समाज का  कल्याण कर सके। गुप्त इसलिये की हम पर उसका  घमंड न आये तथा उसका दुरूपयोग न कर सके। 

तिथि को ही देवी स्वरूपा माना गया है व तिथि के आधार पर नवरात्रि होती है नवदिन नही व नवरात्री होती है। पृथ्वी के घुमने की गती के आधार पर तिथि बनती है न कि ब्राह्मण की सोच से। यह एक गणित है। अमावस की रात्रि मंे पूर्ण अंधेरा होगा और पूर्णिमा की रात्रि मंे चंद्रमा भी पूरा होगा और उजाला भी अगर किसी व्यक्ति के हाथ मंे होता तो अमावस और पुर्णिमा बदल जाती। प्रकृति बदलती अतः प्रकृति के अनुसार पंचांग है विज्ञान से नही पंचांग के अनुसार प्रकृति के नियम और तिथि एक ही होती है दो नही। तिथियों के मानने के नियम मनने वाले अलग-अलग है वह भी इसलिये की  प्रत्येक शक्ति के ईश्वर के उपासना के नियम पद्धति अलग-अलग है। इसलिये मूलतः शक्ति माता के उपासक 4 सम्प्रदाय के लोग जो अलग-अलग रूप से शक्ति को मानते व पूजते है। 

1. शैव सम्प्रदाय - नौ तिथि की नौ शक्तियॉं

प्रथम शैलपुत्री द्वितीया ब्रम्हचारिणी तृतीया चंद्रघंटा, चतुर्थी कूण्माडा, पंचमी स्कंद माता, षष्टी कात्यायनी, सप्तमी कालरात्रि, अष्टमी महागौरी, नवमी सिद्धदात्री।

2. वैष्णव सम्प्रदाय

वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार हस्त नक्षत्र से उत्तरषाढा 9 दिन गणता होती है तथा  दसवे दिन श्रवण नक्षत्र जो कि विष्णु प्रिय नक्षत्र होता है उस दिन तिरूपती मंे ब्रम्होत्सव मनाया जाता है और बुरहानपुर मंे बालाजी का उत्सव मनाया जाता है। उस दिन उत्सव स्वरूप एक दूसरे से मिलते है तथा एक विशेषज्ञ पत्ती शम्मी का धन रूप में आदान प्रदान करते है। उसे सोना समझ कर बाटते है।


वैष्णव सम्प्रदाय की नौ शक्तियां - श्रीदेवी, अमृतोत्भवा, कमला, चंद्रशोभिनी, विष्णु पत्नी, वैष्णवी, वरारोहा, हरिवल्लभा, शार्डंगणी


माधवसंप्रदाय

इस सम्प्रदाय में हनुमान जी के पूजा का बहुत  अधिक महत्व है वह नव दिन  पर्यंत प्रतिदिन नव शक्तियों का पूजन करतेहै। 

1. अधरा एवं उत्तराहनु

2. बुद्धि

3. आत्मबल

4. किर्ती

5. धीरज

6. निडरता

7. आरोग्य

8. फुर्ति

9. भाषण सामर्थ्य 

बोलने की शक्ति शब्द हिन्दी मंे है संस्कृत से परिवत्रित किये है। 


चार नवरात्रि के माह

1. माघ माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक मधु कैटव का वध करने हेतु दशमूखी एवं दशपदा भगवती महाकाली इस नवरात्र मंे अवतरित हुई थी यह गुप्त नवरात्री होती है। 

2. चैत्र माह मंे- शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक इसमें 18 भुजा वाली महालक्ष्मी महिषर्दिनी का अवतरण हुआ था।

3. आषाढ मास - आषाढ मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक इसमें अष्ट भुजा महासरस्वती का पूजन होता है। इसमंे शाकंभरी माता काभी पूजन  होता है। कृषि के लिये लाभदायक है वही शताक्षी महाशक्ति हे। 

नव शक्ति के नव रूप के नवमंत्र

1. शैलपुत्री- हिमालयराज की पुत्री 

वंदे वात्र्छितलाभाय चंद्रार्धकृत शेखराम् वृषारूढां शूलधारा शैलपुत्री यशश्विनीम अर्द चारू वचंद्रसे बद्धकेशी, हाथो मंे त्रिशुल एवं वरदमुद्रा धारण करने वाल है। आप ही बाला त्रिपुर सुंदरी वकन्या कुमारी है। 

2. मॉं ब्रम्हचखरिणी - दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू देव िप्रसीदतु मयि ब्रम्हचारिण्यनुत्तमा। जय मालिका एवं कमण्डल धार करने वाली आप ही गुरू अंबिका है जो ज्ञाननंद प्रदान करती है आप ही गायत्री एवं बालात्रिपुर संदरी रूपा है। 

3. चंद्रघंटा - पिंडज प्रवरारूढ़ चण्डकोपास्त्रकैर्युता प्रसाद तनुते मध्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता लावण्यमयी त्रिलोचना अपने दस हाथों मंे दिव्यायुध धारण किये हुये है। चंद्रघण्टे के नाम से ब्रम्हाण्ड को विस्मित करती है। साधकों के विघ्न व भय को दूर करती है सिह वाहिनी होकरउग्रवीरा के साथ होकर शत्रुओ का नाश करती है। 

4. कुष्माण्डा - सुरासंपूर्ण कलश रूधिराप्लुत मेवच  , दधाना हस्त पद्माभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्त मंे आपके हसने मात्र से ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ती होती है। सिंह पर आसीन होकर अपने सात हाथों मंे दिव्यायुध एवं आठवे मंे जय मालिका धारण किये हुये है। 

5. मॉं स्कन्दमाता -

सिहासनगतां नित्यं पद्माच्त्रित करद्वया

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी


शिव रेतस को धारण करने वाली षड़ानन माता वात्सल्य मयी मूर्ति है। अपने साशको का पुत्रवत पालन करती है।

6. मॉं कात्यायनी

चंद्रहासोज्जवल करा शार्दूलवर वाहना

कात्यायनी शुभं दद्याद् देवि दानव घातिनी।।


कत ऋषी के पुत्र कात्य कहलाये कात्य गौत्र मंे उत्पन्न कात्यायन ऋषि द्वारा असुरों के संहार हेतु भगवती की साधना करने अवतरित हुई। गोपियों ने कृष्ण को पाने हेतु इन्ही कात्यायनी देवी की मार्गशीर्ष माह कालिन्दी यमुना किनारे प्रार्थना की थी।


विबाह हेतु विशेष आराधना मंत्र कन्याओं हेतु

ओम कात्यायनि महामाये महोयोगिन्यधीश्चरी

नदं गोप सुते देवि पतिं मंे करू ते नमः


मॉं कात्यायनी के दरू हाथो मं त्रिशूल, खडग, चक्र शर, शक्ति, खेटक, धनुष, पाश, अंकुश, घंटा या परशु धारण किये हुये है। 


7. कालरात्रि

एक वेणी जपाकर्णपूर नग्न खरास्थिता

लंबोष्ठी कर्णिका कर्णी तैलाभ्याक्तशरीणिी 

वाम पदोल्लसल्लोहलता कण्टक भूषणा

बर्धन् मूर्धं ध्वजा कृष्णा काल रात्रिर्भक्दारी


महानिश की आप अधिष्ठात्री है। विष्णु की योगनिंदा आप ही है। आप ही ने संमोहित कर मधुकैटभी का संहार किया। आप काल की  काल है। दानवगणो तथा कृवृतियों के नाश हेतु आपकी उपासना शुभ है।  क्या हम असुर शक्तियों का सामना हाथ जोडकर कर सकते है। फिर क्या वहहमें छोडेगी। अंहिसा परम धर्म है परंतु धर्म की रक्षा करना उससे भी बड़ा धर्म है। 

8. महागौरी

श्वेते वृषेमारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचिः

महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा


कालरात्रि जब विघ्नों का शमन कर देती है तो शांभवी महागौरी जन कल्याण हेतु आगमन करती है वृष वाहना है उपर के दाहिने हाथ मं डमरू नीचे के हाथ मंे वरमुद्रा उपर के वामहस्त मतें अभय मुद्रा व नीचे के वाम हस्त में त्रिशूल धारण हे। 

9. सिद्धदात्री

सिद्धगंधर्व यसाद्यैरसु रैरपि, सेव्यमाना सदाभूयात् सिद्विदा सिद्विदायिनी।।

नव निधियांे व अष्टसिद्धियांे की अधिष्ठात्री देवी है। देवी पुराण के अनुसार इन्ही की अनुकंपा से ही शिवजी अर्धनरीश्वर रूप को प्राप्त हुये। इनमंे विजय की क्षमता है भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली आप श्री त्रिपुरसुंदरी है। नवरात्रि मंे नव रात्रि मंे उपासना आराधना करने पर ही पूर्ण नवरात्रि की आराधना उपासना का  फल मिलता है। अतः अष्ठमी को  उपासना नही टुटता है केवल कुल देवी का पूजन कर परंपरागत अनुसार प्रसाद ग्रहण करे। साधना आराधना उपासना पूर्ण 9 दिन करे। 8 दिन नही क्योकि मॉं सिद्धिदात्री की आराधना साधना का नौवा दिन नवमी तिथि है। जो  आपको नव निधि व अष्टसिद्धी देती है तथा माता की स्थापना भी नो दिन रौरात्रि होना चाहिये। विसर्जन दशमी तिथि को होना  चाहिये और भंडारा भी ।

जय माता दी

मॉं दुर्गा को नवदुर्गा भी कहते है मॉं दुर्गा के ही नौ रूपनवार्ण मंत्र (मूल)

ऊ ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै

मां सस्वती का मूल मंत्र है।

ह्ीं मॉं लक्ष्मी का मूलमंत्र है

ह्ीं मॉं काली का मूल मंत्र है

अब मंत्र का तंत्र जो मंत्र के तंत्र को समझ जाये अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग करे वही तंत्र और तांत्रिक क्रिया है। 

ऐं ह्ीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै (सरस्वती प्रधान)

ह्ीं क्लीं ऐं चामुण्डायै विच्चै (लक्ष्मी प्रधान)

क्लीं ऐं ह्ीं चामुण्डायै विच्चै (आकर्षण प्रधान)

क्लीं ह्ीं ऐं चामुण्डायै विच्चै (काली प्रधान )

विशेष - नवरात्रि मंे आराधना करते समय विशेष ध्यान रखे सा पूर्ण रात्रि करें या रात्रि मंे 11 बजे तक फिर सुबह ब्रम्ह मुुहूर्त मं रात्रि 11 बजे से 3 बजे तक नही। 

दस महाविध्या मं एक महाविद्या का नाम मां पिताम्बरा है। तंत्र और तांत्रिक शब्द डर का नाम नही है समझने का है। मॉं पिताम्बरा के बारें मंे भ्रम ज्यादा है। इनकी आराधना दो रूप म होती है। मॉं का एक रूप है चतुर्भूज चार भुजा वाली यह लक्ष्मी व सरस्वती के रूप मंे है। इनकी आराधना सहज व सुलभ है। दुसरा रूप है मॉं काली का जिनके दो हाथ है जो तामसी रूप है तथा चार भुजा वाली मॉं का रूप उत्तर आम्नाथ तथा दो भुजा वाली दक्ष्णि आम्नाय है। इनके आराधक को मांकभी पराजित नही होने देती तथा सदा विजय दिलाती है। दतियां मंे इनका स्थान जहां जवाहरलाल नेहरू भारत पाकिस्तान युद्ध मंे विजय प्राप्त होने पर वहन केबाद पुर्णाहुती करने आये थे भारत वर्ष मे लगभग पूर्व के व आज के स्भी शिर्ष नेता लगभग अधिक तर नेता माता के दरबार मे माथा टेकने आते हे। इनका एक स्थान नलखेा मे भी है जो महाभारत कालिन बताया जाता है। कहां जाता है कि पांडव द्वरा इनकी स्थापना कृष्ण जी ने करवायी थी। युद्ध मंे विजय के लिये। किसी भी पार्थिव मुर्ती का पूजन करने के बाद विसर्जित अवश्य करे। उत्तर मुखी माता कापूजन नही करना चाहिये। जय माता दी।ं। शास्त्र मंे उत्तर मुखी शक्ति का पूजन के लिये मना किया गया है। 

’’जय माता दी’’


 

                                                                               

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