मेरा शहर मेरी विरासत

 मेरा शहर मेरी विरासत

असीरगढ़ किला- आज भी अजेय किले के रूप में खड़ा है असीरगढ़ का ऐतिहासिकल किला, तीन भागों में बंटा है किला- असीरगढ़, कमरगढ़ और मलयगढ़  
- इतिहासकारों ने इसे दक्खन की कंुजी कहा, 259.1 मीटर उंचा और समुद्र तल से 701 मीटर उंचाई पर है यह किला
असीरगढ़ का किला देश-विदेश के पर्यटकों के लिए एक लुभावना पर्यटन स्थल है। यह बुरहानपुर से लगभग 20 किमी दूर एक ऐतिहासिक और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण किला है। यहां सतपुड़ा पहाड़ियों के एक टीले के शीर्ष पर एक ऐतिहासिक अजेय किला है। इस किले को भारत के दक्षिणी हिस्से को विनियमित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था, क्योंकि कुछ इतिहासकार ने इसे दक्खन की कुंजी नाम से संबोधित किया था। यह अपने आधार से लगभग 259.1 मीटर ऊंचा और समुद्र तल से 701 मीटर ऊंचा है। देखने के लिए इस किले के अंदर एक मस्जिद, भगवान शिव मंदिर और एक महल है। यह वास्तव में 3 भागों में विकसित किया गया है और प्रत्येक भाग का अपना नाम है। पहले भाग को असीरगढ़ कहा जाता है, दूसरे भाग को कमरगढ़श् और रोमांचित भाग को मलयगढ़श्कहा जाता है।
देश ही नहीं विदेश से भी आते हैं पर्यटक,


असीरगढ़ मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले में स्थित एक गांव है। असीरगढ का ऐतिहासिक क़िला बहुत प्रसिद्ध है। असीरगढ़ क़िला बुरहानपुर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाड़ियों के शिखर पर स्थित है। यह क़िला आज भी अपने वैभवशाली अतीत की गुणगाथा का गान मुक्त कंठ से कर रहा है। इसकी तत्कालीन अपराजेयता स्वयं सिद्ध होती है। इसकी गणना विश्व विख्यात उन गिने चुने क़िलों में होती है जो दुर्भेद और अजेय माने जाते थे। इतिहासकारों ने इसका बाब.ए.दक्खन, दक्षिण द्वार और कलोद.ए.दक्खन दक्षिण की कुंजी के नाम से उल्लेख किया है, क्योंकि इस क़िले पर विजय प्राप्त करने के पश्चात दक्षिण का द्वार खुल जाता था और विजेता का सम्पूर्ण ख़ानदेश क्षेत्र पर अधिपत्य स्थापित हो जाता था। इस क़िले की स्थापना कब और किसने की यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार स्पष्ट व सही राय रखने में विवश रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस क़िले का महाभारत के वीर योद्धा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की अमरत्व की गाथा से संबंधित करते हुए उनकी पूजा स्थली बताते हैं। बुरहानपुर के गुप्तेश्वर  महादेव मंदिर के समीप से एक सुंदर सुरंग है जो असीरगढ़ तक लंबी है। ऐसा कहा जाता है कि पर्वों के दिन अश्वत्थामा ताप्ती नदी में स्नान करने आते हैं और बाद में गुप्तेश्वर की पूजा कर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।
आश्चर्यचकित कर देने वाला इतिहास समेटे हुए है यह किला
वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किए गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी में यहां बड़ानगर आबाद था और यह केवल अंगूर की काश्त के लिए मशहूर था। जिसके अंगूर 1870 ईण् तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है।
ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी.सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहां की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर शिव का भव्य प्राचीन मंदिर है जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। कनिष्क के भी इस ओर आने के उल्लेख इतिहास में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे़ फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है जहां सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नौमान शाह का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुंचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहां से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी मुग़ल कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Featured Post

अर्चना चिटनिस की पहल रंग लाई: भोपाल-भुसावल मेमू रेल सेवा का प्रस्ताव विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित!