kundi bhandara, (Khuni bhandara) Burhanpur
कुण्डी भंडारा, बुरहानपुर (खुनी भंडारा)
हेलो फ्रैंड्स आज हम कुण्डी भंडारे के बारे में जानेंगे जो सतपुड़ा की पहाड़ियों को चिर कर बनाया गया है। जमींन से 80 फिट अंदर घुमावदार रास्तो के जरिये इसका निर्माण किया गया है इसके अंदर जाने पर पता चलता है की यह देखने में एक अद्भुत दृश्य है इसके अंदर जैसे ख़ुफ़िया रास्ते होते है वैसे ही इसका भी निर्माण किया गया है इसके अंदर जाते ही हम पूरी तरह से भीग (गीले) जाते है क्योकि चारो और से पानी टपकता है और निचे भी पानी की नहरे है, जितना आगे जाओ उतना पानी बढ़ता जाता है में जब इसके भीतर गया तो पानी घुटनो तक था पर जैसे जैसे आगे बढ़ता गया पानी की गहराई भी बढ़ती गई। इसके चारो और पानी का खार जमा हुआ है, इसमें निचे जाने के लिए एक लिफ्ट का निर्माण किया गया है। इस लिफ्ट से निचे जाने के लिए टिकिट भी लेना पड़ता है।
आज से 409 साल पहले इसका निर्माण हुआ है। यह कुण्डी भंडारा मुग़ल काल का बना हुआ है, सन 1612 में निर्माण हुआ था, बुरहानपुर के सूबेदार अब्दुर्रहीम खान ए खाना ने उस समय हो रही पानी की किल्लत से निजात पाने के लिए इसका निर्माण करवाया था। जो आज भी बुरहानपुर शहर को पानी की पूर्ति कर रहा है। इसी वजह से बुरहानपुर शहर में इसका निर्माण होना एक वरदान साबित हुआ है। इनका निर्माण जमींन से 80 से 90 फिट अंदर किया गया है यह सोचने वाली बात है की उस समय सतपुड़ा की पहाड़ियों को काट कर या चिर कर किए इसका निर्माण किया गया होगा। इसमें पानी का मुख्य स्त्रोत सतपुड़ा की पहाड़ी और झरनो में है। इन नहरों के जरिये जमींन के अंदर से पानी का पुरे शहर में वितरण तो होता ही है साथ ही कुछ जगह पर इसकी कुंडीया बाहर भी बानी हुई है जिसमे से पानी निकला जाता है। इसका पानी बहुत ही साफ और शुद्ध होने के साथ-साथ पीने में बहुत ही मीठा लगता है।
निर्माण किसने किया - अब्दुर्रहीम खान ए खाना
निर्माण कब हुआ - सन 1612
निर्माण क्यों किया रहा - पानी की किल्लत से निजात पाने के लिए
गहराई कितनी है - 80 फिट
कितनी है कुंडिया - 101 ( कुछ धस कर मिट चुकी है )
कहा-स्थित है कुण्डी भंडारा
कुण्डी भंडारा महाराष्ट्र की सिमा से लगे मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर के गांव पातोंडा में स्थित है। कुछ लोग कुण्डी भंडारे को खुनी भंडारा भी कहते है पर खून से इसका कोई संबंध नहीं है। इसकी कुंडिया बुरहानपुर शहर में कई जगह पर स्थित है जिसमे से एक बुरहानपुर का रेलवे स्टेशन भी है। इसके पानी का सप्लाई लालबाग, पातोंडा दोनों गावों में किया जाता है जहा लगभग 4000 लोग स्थित है,
जहा जहा बहार कुंडिया स्थित है वह कुछ इस तरह दिखाई देती है।
जब में कुण्डी भंडारे के बहार की कुण्डी को देखने गया तो उसके अंदर हरी हरी काई जमी हुई थी और पानी बहुत ही निचे दिखाई दे रहा था। जो फोटो में दिखाई दे रहा है।
बुरहानपुर भारत के एक राज्य मध्यप्रदेश में स्थित है. यह ताप्ती नदी के किनारे है| यह किसी पहाड़ी पर स्थित नहीं है| भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित इसका इतिहास बहुत निराला है | यह ज़िले का मुख्यालय भी है और ताप्ती नदी के किनारे बसा हुआ है। बुरहानपुर शहर महाराष्ट्र से लगा हुआ है | अगर इसके इतिहास की बात की जाये तो यहाँ कई ऐतिहासिक स्थल हे जहा कई राजा महाराजाओ ने राज किया|
सबसे पहले बात की जाये तो सन 1536 इस्वी में गुजरात विजय अभियान के पश्चात हुमायू बडौदा, भरूच और सूरत होते हुए बुरहानपुर और असीरगढ आये थे। राजा अली खां जो आदिलशाह के नाम से जाने जाते थे जिन्होंने अकबर की खानदेश अभियान के दौरान अधीनता स्वीकारते हुए अपनी शाह की उपाधि का त्याग कर दिया इसी घटना से मुगलों की दक्षिण की नीति बदल गई । ऐसे देखा जाये तो कई राज यहाँ दफ़न है|
राजा की छतरी का इतिहास
बुरहानपुर से लगभग 4 किलो मीटर की दूरी पर ताप्ती के किनारे राजा की छतरी स्थित है| ऐसे तो यह एक स्मारक है परन्तु इसे राजा की छतरी के नाम से जाना जाता है | इस छतरी का निर्माण मुगल साम्राट औरंगजेब के आदेश से राजा जयसिंह के सम्मान में किया गया था राजा जयसिंह दक्खन में मुगलसेना के सेनापति थे। राजा जयसिंह जब दक्खन अभियान से लौट रहे थे तब बुरहानपुर में उनकी मृत्यु हो गई थी। कहा जाता है कि इस स्थान पर उनका दाह संस्कार किया गया था | सन 1599ई. में अकबर ने बुरहानुर पर पूर्णत अधिकार कर लिया था अकबर ने 1601 ई में खानदेश को मुग़ल साम्राज्य में शामिल किया गया था शाह यहाँ के बारे में ऐसा भी कहा जाता है की शाह जहा की सबसे प्रिय बेगम मुमताज की मृत्यु यही पर हुई थी, बुरहानपुर में 390 साल पहले जून महीने में ही प्रसूति के दौरान मुमताज की मृत्यु हुई थी। तब मुमताज की याद में ताजमहल तो आगरा में बनाया गया था लेकिन ताजमहल बनने तक मुमताज का शव बुरहानपुर में ताप्ती नदी किनारे एक कब्र में दफनाकर रखा गया था।
कई राजाओं ने किया बुरहानपुर पर राज
शाहजहाँ तथा ओरंगजेब बुरहानपुर दक्कन के सूबे का मुख्य स्थान था बुरहानपुर में कई सालो तक मुगलो और मराठो की झड़प चलती रही बुरहानपुर आज भी इसकी गवाही देता है। 16 वीं शताब्दी के मध्य से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक बुरहानपुर सहित निमाड क्षेत्र औरंगजेब, बहादुर शाह, पेशवा, सिंधिया, होलकर, पवार और पिण्डारियों से प्रभावित रहा । बाद में 18वीं शताब्दी की शुरूआत में निमाड़ क्षेत्र का प्रबंधन ब्रिटिश के अधीन आ गया। अंग्रेजो के विरूद्ध देशव्यापी 1857 के महान विप्लव से बुरहानपुर भी अछुता नहीं रहा । तात्या टोपे ने निमाड़ क्षेत्र से बाहर जाने के पूर्व खण्डवा, पिपलोद इत्यादि जगहों पर पुलिस थानों और शासकीय भवनों को आग के हवाले किया था । राजा अली खां (1576;1596 ई) जो आदिलशाह के नाम से जाने जाते थे जिन्होंने अकबर की खानदेश अभियान के दौरान (1577) अधीनता स्वीकारते हुए अपनी शाह की उपाधि का त्याग कर दिया इसी घटना से मुगलों की दक्षिण की नीति बदल गई । इसके उपरान्त खानदेश को आधारस्थल बनाकर यहॉं से दक्षिण के अभियान चलाए जाने लगे । राजा अली खान पे कई ख्यात भवन बनाऐ । जैसे : असीरगढ के उपर (1588 ई) जामा मसजिद, बुरहानपुर की जामा मसजिद (1590 ई) असीरगढ में ईदगाह; बुरहानपुर में मकबरे और सराय, जैनाबाद में सराय एवं मसजिद इत्यादि
राजा अली खान के उत्तराधिकारी बहादुरखान(1596-1600 ई) ने मुगलों से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और अकबर और उसके राजकुमार दानियाल को मान्यता नहीं दी । कुपित होकर अकबर ने 1599 में बुरहानपुर की ओर प्रस्थान किया और 8 अप्रेल 1600 ई. में बिना किसी अवरोध के नगर पर कब्जा कर लिया । इस दौरान अकबर असीरगढ के चार दिवसीय व्यक्तिगत दौरे पर भी गए ।
शाहजहॉं का अभियान:-1617 में जहांगीर ने राजकुमार परविज की जगह पर राजकुमार खुर्रम को दक्खन का राज्यपाल नामांकित किया गया और उसे शाह की उपाधि दी । खुर्रम के नेतृत्व में मुगलसेना व्दारा शांतिपूर्ण विजयों से प्रसन्न होकर जहॉंगीर ने 12 ऑक्टोबर 1617 ई. में उसे शाहजहॉं की उपाधि से सम्मानित किया । 1627 में जहांगीर की मृत्युपश्चात शाहजहॉं मुगल बादशाह बनें । 1 मार्च 1630 को दक्खन में असंतोषजनक परिस्थितियों के कारण, मुगलगबादशाह शाहजहॉं बुरहानपुर आए । इस समय वे बीजापुर, गोलकुण्डा और अहमदनगर अभियानों के चलते दो वर्षों तक यहॉं रहे । इन अभियानों के दौरान ही शाहजहॉं की प्रिय बेगम मुमताज महल का प्रसवपीड़ा से निधन हो गया । मुमताज महल का शव ताप्ती के उस पार जैंनाबाद के एक बगीचे में दफन किया गया था । उसी वर्ष दिसंबर के शुरू में (1631 ई), मुमताज महल के शारिरीक अवशेष आगरा पहुंचाए गए । 1632 में महावत खान को दक्खन का वाइसराय बनाकर शाहजहॉं ने बुरहानपुर से आगरा प्रस्थान किया ।
आसीर का किला
ऐसे तो इस किले में कई राज छुपे हुए है, असीर का किला कहा जाने वाला यह किला बुरहानपुर से २० किलो मीटर की दुरी पर स्थित है | इस किले की उचाई ७५० मीटर है और यह ६० एकड़ में बना हुआ है, इस किले में ५ तालाबों के साथ-साथ दो कुंड भी है यहाँ पहले मुगलो का शासन था और आजादी के पहले अंग्रेजो ने भी इस पर शासन किया है ऐसे देखा जाये तो इस किले के अंदर कई कहानिया छुपी हुई है| हजारो साल पहले बने इस किले को कई राजा महाराजाओ ने जितने की कोशिश की पर कोई भी इस किले पर जित हासिल नहीं कर पाया और जिसने भी इस किले पर जित हासिल की वह छल कपट से ही हासिल की | इसमें प्रवेश करने के दो रास्ते है एक रास्ता उत्तर की और और दूसरा पूर्व में उत्तर दिशा के रास्ते वहां से वाहन की सहायता से जाया जा लेकिन पूर्व से जाना हो तो सीढिय़ों से चढ़कर जाना होगा हैं जहा से आपको 1000 सीढिया चढ़ कर जाना पड़ेगा।
किस तरह किया निर्माण
इस किले का निर्माण १४ सदी में आशा अहीर (अहीर राजा) ने करवाया था | इसमें बलुआ पत्थर और सुर्खी चुने का उपयोग किया गया था इसका निर्माण इस तरह से किया गया हे की यह तीन भागो में विभाजित दिखाई देता है ऊपर का हिस्सा असीर, बिच का हिस्सा कमरगढ़ और सबसे निचला हिस्सा मलयगढ कहलाता है| यह क़िला आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्भुत किला है, जो अपना उदाहरण आप ही देता है। इसके दरवाजे इतने मजबूत थे की कोई भी इन्हे तोड़ कर अंदर प्रवेश नहीं कर पता था असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम असीरगढ़ भी हे जो किले की वजह से प्रसिद्ध है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इसको पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर शिव का भव्य प्राचीन मंदिर भी स्थित है, यह मंदिर काले पत्थरो से निर्मित किया गया है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है, यह दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह बनाया गया है, जिसमे अफ़सरों के साथ साथ सरकारी अधिकारी, मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग ५० - ५५ क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी मुग़ल कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं। यहाँँ गुप्तेश्वर महादेव का मँंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है कहते हैं अश्वथामा अभी भी महादेव की प्रतिदिन पूजा करते हैं
क्या है अश्वस्थामा की कहानी
इस किले के बारे में कहा जाता है की आज भी महाभारत काल के अश्वत्थामा अपने पिता गुरु द्रोण की हत्या का बदला लेने के लिए अब भी भटक रहे हैं। कई बार अश्वत्थामा गांव वालों को भी दिखाई दिए हैं। यह अश्वस्थामा आते है और शिव जी की पूजा कर १ फुल रखते है| कुछ समय पहले किसी न्यूज़ चैनल के रिपोटर ने रात भर इस किले पर रहने का निर्णय लिया और रात भर वह अश्वस्थामा को देखने के लिए रुके भी परन्तु सुबह ४ लगभग उनकी आँख कुछ ही समय के लिए लगी और उतनी देर में वह कोई पूजा करके चला भी गया इसका मतलब यह हे की कोई कुछ अश्वस्थामा वहां आकर भगवान् शिव की पूजा करते ही है| महाभारत काल लगभग 5000 वर्ष पहले का माना जाता है, इतने वर्षों बाद भी अश्वत्थामा का जिंदा रहना महाभारत की कहानी बयां करता है, जिसमें कृष्ण ने उन्हे अमरता का वरदान दिया था। गांव वालों का कहना है कि अश्वत्थामा किले में बने शिव मंदिर में रोज शिव की आराधना करने आता है। कई ग्रामीणों ने इसे देखा है और खेत व सतपुड़ा के जंगल में भी इनके बड़े-बड़े पांव देखे हैं। यहां तक की एक पुलिसकर्मी को भी अश्वत्थामा ने घायल किया है।
अकबर भी बेताब हो गए थे किले पर कब्जा करने के लिए
इस किले पर वैसे तो कई राजाओ ने कब्ज़ा करने का सोचा और कोशिश भी पर किसी को भी जित हासिल नहीं हो पायी जब इस किले के बारे में धीरे-धीरे लोकप्रियता बढ़ती गई तो राजा मोहम्मद अकबर जिनका पूरे देश पर कब्जा था वे भी इस पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए व्याकुल हो उठे थे। उस समय इस किले पर बहादुरशाह फारूखी का कब्जा था। जब उसे पता चला कि अकबर इस किले पर कब्जा करना चाहते हैं और सेना भेज रहे हैं तो उसने इस किले की व्यवस्था इतनी दुरुस्त और शक्तिशाली तरीके से की कि किले में कई सालो (लगभग १० साल ) तक खाने की वस्तुएं उपलब्ध हो सकतीं थीं।
जब अकबर ने किया आक्रमण
जब अकबर ने इस किले पर आक्रमण किया तो किले के सारे दरवाजे बंद होने पर अकबर कुछ भी नहीं कर पाए ऐसे में अकबर को छह महीने तक इस किले के नीचे खड़ा रहना पड़ा था। सम्राट कहे जाने वाले अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण तो किया लेकिन किले के सारे रास्ते बंद होने के कारण वे किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सके और हार मान गए। इसके बाद अकबर ने एक रणनीति तैयार की और बहादुरशाह को संदेश भेजकर यह विश्वास दिलाया कि वे आपस में बात करना चाहते हैं किसी पर कोई प्राणघातक हमला नहीं किया जाएगा। बात करने के लिए बहादुरशाह किले से बाहर आया और जब बातचीत चल रही थी तभी पीछे से आकर हमला कर दिया और जख्मी हालत में गिरफ्तार कर बंदी बना लिया और 17 जनवरी 1601 ई. को असीरगढ़ के किले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई व किले पर मुगल शासक का झंडा फहरा दिया गया। उसके बाद भी शासक आए लेकिन अंत में 1904 ई. में इस पर अंग्रेज़ी सेना ने रहना शुरू कर दिया ।








0 टिप्पणियाँ